मिथिला की महान संस्कृति और ब्राह्मण समाज के गौरव महान और प्रख्यात विद्वान श्री मंडन मिश्र और उनकी विदुषी धर्मपत्नी भारती से जब आदि शंकराचार्य पराजित हुए तो दुनिया स्तब्ध ही उठी, लेकिन मिथिला के लिए और अपने भगवान श्री परशुराम वंश के सहरसा वासी के सभी आमजन के लिए यह गर्व की बात थी।इसी ऐतिहासिक धरा पर आज से लगभग चालीस वर्ष पूर्व उसी महिष्मति (महिषी) नगरी, मां उग्रतारा धाम के युगपुरुष श्री नारायण चौधरी सहयोगी श्री किशोर राय,श्री महेश्वर खां,श्री संजय मिश्र,श्री काली प्रशाद झा,श्री बाचस्पती झा,श्री गुरुदेव ठाकुर,श्री यदुवीर ठाकुर ,श्री मधु कांत झा, सहित दर्जनों कुलीन ब्राह्मणों ने अपने समाज के उत्थान हेतु एक संकल्प लिए जो अनेक बिघ्न, बाधाओं को पार कर विशाल बट वृक्ष बन चुका है।समाज के सर्वांगीण उत्थान हेतु अपन सर्वस्व त्याग हेतु तैयार सैकड़ों दघिची ने उसका प्रमाण दिया है विगत चार दशक से।यह है आपका ,उनका , और हम सभी परशुराम बंश के आन बान शान का प्रतीक ब्राह्मण महासभा सहरसा।

आज आपके इस महासभा से लगभग दो हज़ार से भी ज्यादा युवा और सैकड़ों से भी ज्यादा अभिभावक जुड़े हुए हैं। सहरसा जिले के सभी प्रखंड, पंचायत और घर घर तक इसका पहुंचना इसकी विशालता और स्वीकार्यता को दर्शाता है।सभी परशुराम वंश के लोगों का एक ही नारा जय जय श्री परशुराम हमारा।आपके इस महासभा परिवार में मैथिल, कान्यकुब्ज,मारवाड़ी,भूमिहार, सहित ब्राह्मण ऐसे जुड़े हुए है जैसे भारतवर्ष के राज्य अपने राष्ट्र से।